ग़ज़ल 11

शेर 13

तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम

घरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं

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तुम्हारे हिज्र में मरना था कौन सा मुश्किल

तुम्हारे हिज्र में ज़िंदा हैं ये कमाल किया

सुबू में अक्स-ए-रुख़-ए-माहताब देखते हैं

शराब पीते नहीं हम शराब देखते हैं

हवस जान तुझे छू के देखना ये है

तुझे ही देख रहे हैं कि ख़्वाब देखते हैं

अभी तो मैं ने फ़क़त बारिशों को झेला है

अब इस के ब'अद समुंदर भी देखना है मुझे

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

आरिफ़ इमाम

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