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आरिफ़ इमाम के शेर

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तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम

घरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं

तुम्हारे हिज्र में मरना था कौन सा मुश्किल

तुम्हारे हिज्र में ज़िंदा हैं ये कमाल किया

हवस जान तुझे छू के देखना ये है

तुझे ही देख रहे हैं कि ख़्वाब देखते हैं

सुबू में अक्स-ए-रुख़-ए-माहताब देखते हैं

शराब पीते नहीं हम शराब देखते हैं

इक बरस हो गया उसे देखे

इक सदी गई है साल के बीच

अभी तो मैं ने फ़क़त बारिशों को झेला है

अब इस के ब'अद समुंदर भी देखना है मुझे

बना रहा हूँ अभी घर को आइना-ख़ाना

फिर अपने हाथ में पत्थर भी देखना है मुझे

अपने ही पैरों से अपना-आप रौंद

अपनी हस्ती को मिटा कर रक़्स कर

एक पर्दा है बे-सबाती का

आइने और तिरे जमाल के बीच

उसी की बात लिखी चाहे कम लिखी हम ने

उसी का ज़िक्र किया चाहे ख़ाल-ख़ाल किया

ये मिट्टी मेरे ख़ाल-ओ-ख़द चुरा कर

तिरा चेहरा बनाती जा रही है

ख़ून कितना बहा था मक़्तल में

मेरी आँखों में ख़ून उतरने तक

अजब था नश्शा-ए-वारफ़तगी-ए-वस्ल उसे

वो ताज़ा-दम रहा मुझ को निढाल कर के भी

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