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ज़ीशान साहिल

1961 - 2008 | कराची, पाकिस्तान

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर/अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर/अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

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किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को

ख़त्म कर देता है हर उम्मीद हर इम्कान को

मैं ज़िंदगी के सभी ग़म भुलाए बैठा हूँ

तुम्हारे इश्क़ से कितनी मुझे सहूलत है

गुज़र गई है मगर रोज़ याद आती है

वो एक शाम जिसे भूलने की हसरत है

जो हमें पा के भी खोने से बहुत पीछे था

हम उसे खो के भी पाने से बहुत आगे हैं

कितने हैं लोग ख़ुद को जो खो कर उदास हैं

और कितने अपने-आप को पा कर भी ख़ुश नहीं

खिड़की के रस्ते से लाया करता हूँ

मैं बाहर की दुनिया ख़ाली कमरे में

वो दास्तान मुकम्मल करे तो अच्छा है

मुझे मिला है ज़रा सा सिरा कहानी का

बस एक रंग है दिल में किसी के होने से

अब अपने-आप को इस से भी सादा क्या करना

कोई के हमें ढूँडेगा तो खो जाएगा

हम नए ग़म में पुराने से बहुत आगे हैं

अब तो ये शायद किसी भी काम सकता नहीं

आप ही ले जाइए मेरे दिल-ए-नादान को

आया था मेरे पास वो कुछ देर के लिए

सूरज मगर गहन में बहुत देर तक रहा

जो वो नहीं था तो मैं मुत्तफ़िक़ था लोगों से

वो मेरे सामने आया तो इख़्तिलाफ़ किया

हवा बहार की आएगी और मैं चूमूँगा

वो सारे फूल कि जिन में तिरी शबाहत है