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नज़्म
कोई ये कैसे बताए
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन
कैफ़ी आज़मी
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नज़्म
जुगनू
रचा सकी मिरी आँखों में जो न काजल भी
वो माँ जो मेरे लिए तितलियाँ पकड़ न सकी
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
तुम याद मुझे आ जाते हो
तुम याद मुझे आ जाते हो
जब कोई किसी का हाथ पकड़ कर सैर को बाहर जाता है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
ईद मनाऊँ कैसे
याद आता है तेरा उँगली पकड़ कर चलना
उन झरोंकों को भुलाऊँ तो भुलाऊँ कैसे

