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ग़ज़ल
फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं
मगर दाग़-ए-जिगर पर सूरत-ए-लाला लहकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला-2
मैं ऊँघता था कि साँस ले लूँ
मगर वो चूल्हों पे हाँडियों में फ़रेब पकते
अली अकबर नातिक़
समस्त