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ग़ज़ल
टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच
सुरख़ाब बैठे पानी में हैं मिल के चार पाँच
बहादुर शाह ज़फ़र
नअत
क़िस्मत है अपनी अपनी पाते हैं पाने वाले
बटता है पंज-तन का सदक़ा तिरी गली में
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
बसर हो मय-कदे में पंज-शम्बा बैठ कर जिस का
जो मय-नोशी में कर दे सुब्ह आदीना उसी का है
शाद अज़ीमाबादी
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paanii
पानी پانی
पानी, जल, प्राचीन विचारधारा के अनुसार चार तत्वों में से एक तत्व जो आधुनिक विज्ञान के अनुसार ऑक्सीजन एक भाग और हाईड्रोजन दो भाग का यौगिक तरल पदार्थ है (जिसका चिह्न HO2 है)
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ग़ज़ल
तू जहाँ के बहर-ए-अमीक़ में सर पर हुआ न बुलंद कर
कि ये पंज-रोज़ा जो बूद है किसू मौज-ए-पुर का हबाब है
मीर तक़ी मीर
नज़्म
रस्म
कभी इन पंज-वक़्ता खिड़कियों से धूप के मीनार पर चढ़ कर
ये हय-अल-सस्लात-ए-दिल की गूँजें चाक करती है
आतिफ़ तौक़ीर
नज़्म
दुख मैले आकाश का
गालों पर बहने लगता है
फिर ठोड़ी के पंज-नद पर सब दुखों के धारे आ मिलते हैं
वज़ीर आग़ा
शेर
मैं शौक़-ए-वस्ल में क्या रेल पर शिताब आया
कि सुब्ह हिन्द में था शाम पंज-आब आया
मर्दान अली खां राना
ग़ज़ल
मैं शौक़-ए-वस्ल में क्या रेल पर शिताब आया
कि सुब्ह हिन्द में था शाम पंज-आब आया






