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ग़ज़ल
क्यूँकि निकले तेरा उस का दिल में पैकाँ छोड़ कर
जाए बैज़े को कहाँ ये मुर्ग़-ए-पर्रां छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
तिरा रूप रूह के रू-ब-रू तिरी प्रीत प्रान में मू-ब-मू
तू कमाल-ए-हुस्न-ए-कलाम है तू मिसाल माह-ए-तमाम है
नासिर शहज़ाद
नज़्म
मावरा
जिन से बढ़ कर कोई नज़रों का शनासा भी नहीं
हाए वो लम्हा-ए-पराँ वो दिल-आवेज़ अदा
वहीद अख़्तर
नज़्म
क़ुर्ब-ए-क़यामत
जहाँ घोंसलों और उड़ानों के मा-बैन
धातों की पर्रां फ़सलें नहीं थीं
ख़ुर्शीद रिज़वी
ग़ज़ल
देखिए राह-ए-अदम में और पेश आता है क्या
होश पर्रां हो रहे हैं पहली मंज़िल देख कर









