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पारसाई
पारसाई शायरी
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नज़्म
लेनिन
कब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीना
दुनिया है तिरी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-मुकाफ़ात
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वहशत-ए-दिल से फिरना है अपने ख़ुदा से फिर जाना
दीवाने ये होश नहीं ये तो होश-परस्ती है
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शुग़्ल-ए-मय-परस्ती गो जश्न-ए-ना-मुरादी था
यूँ भी कट गए कुछ दिन तेरे सोगवारों के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात
कि इस हवाले से राय क्या है
ये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला है
तारिक़ क़मर
नज़्म
ताज-महल
ये दमकती हुई चौखट ये तिला-पोश कलस
इन्हीं जल्वों ने दिया क़ब्र-परस्ती को रिवाज
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
याद
मिरी नज़रों से ओझल अब मक़ाम-ए-जोहद-ए-हस्ती है
न वो एहसास-ए-इशरत है, न वो अंजुम-परस्ती है
शौकत परदेसी
ग़ज़ल
ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
घटा के भेस में मय-ख़ाने पर रहमत बरसती है





