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नज़्म
सब जानते हैं इल्म से है ज़िंदगी की रूह
आख़िर उठा सफ़र को वो मर्द ख़स्ता पए
अहबाब चंद साथ थे ज़ी-इल्म-ओ-ख़ुश-कलाम
अकबर इलाहाबादी
उद्धरण
बाज़-औक़ात ग़रीब को मूंछ इसलिए रखनी पड़ती है कि वक़्त-ए-ज़रूरत नीची कर के जान की अमान पाए।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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ग़ज़ल
ये किस की शक्ल आँखें बंद करते ही नज़र आई
ये किस का नाम लब पर ख़ुद पए अफ़्साना आता है
जौहर ज़ाहिरी
ग़ज़ल
इश्क़ के मकतब में जब आया पए दर्स-ए-जुनूँ
पहले ही उँगली उठी नून-ए-गरेबाँ की तरफ़
