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नज़्म
ज़िंदाँ की एक सुब्ह
नींद की ओस ने उन चेहरों से धो डाला था
देस का दर्द फ़िराक़-रुख़-ए-महबूब का ग़म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आप के पीछे पीछे फिरने से तो रहे इस 'उम्र में हम
राह पे आ बैठे हैं ये भी ग़नीमत बहुत ज़ियादा है
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
हम आवारा गाँव गाँव बस्ती बस्ती फिरने वाले
हम से प्रीत बढ़ा कर कोई मुफ़्त में क्यूँ ग़म को अपना ले
हबीब जालिब
नज़्म
कॉफ़ी-हाउस
सिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ चलने फिरने से लाचार
चेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमार
हबीब जालिब
नज़्म
शरारे
इक निगार-ए-नाज़ की फिरने लगीं आँखें 'मजाज़'
इक बुत-ए-काफ़िर का दिल दर्द-आश्ना होने लगा









