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piiTh
पीठ پِیٹھ
किसी स्थान पर बैठने की क्षमता, सुभीता या स्थिति। पहुँच। जैसे-वहाँ तुम्हारी पैठ नहीं हो सकेगी। स्त्री० = 4ठ (बाजार)
piTaa
पिटा پِٹا
वह पत्र या लेख्य जो मध्ययुग में असामी या काश्तकार किसी जमींदार की जमीन जोतने-बोने के लिए लेते समय उसे इसलिए लिखकर देता था कि नियत समय के उपरांत जमींदार को उस जमीन का फिर से मनमाना उपयोग करने का अधिकार हो जायगा। विशेष-इसकी स्वीकृति का सूचक जो लेख्य जमींदार लिख देता था, उसे ' कबूलियत ' कहते थे। क्रि० प्र०-लिखना।-लिखाना।
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नज़्म
बरसात की बहारें
बैठे हैं कितने ख़ुश हो ऊँचे छुआ के बंगले
पीते हैं मय के प्याले और देखते हैं जंगले
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
माँ तिरे जाने के बा'द
कौन मरहम ज़ख़्म-ए-जाँ पर प्यार से रख पाएगा
दर्द की शिद्दत में मेरी पीठ को सहलाएगा
शहनाज़ परवीन शाज़ी
शेर
हज़ारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में
मगर इक फ़ाएदा है पीठ पर ख़ंजर नहीं लगता
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वार सब पीठ पे करते हैं यूँ दिल में रह कर
तू बता दे मैं दुआ दूँ तो दुआ दूँ किस को
