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नज़्म
हिज्र की राख और विसाल के फूल
आज फिर दर्द-ओ-ग़म के धागे में
हम पिरो कर तिरे ख़याल के फूल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
मोती हूँ तो फिर सोज़न-ए-मिज़्गाँ से पिरो लो
आँसू हो तो दामन पे गिरा क्यूँ नहीं देते
मुर्तज़ा बरलास
ग़ज़ल
शब-ए-हिज्राँ के माथे पर सवेरे फिर से रौशन हों
ये रुत गजरे पिरो जाए अगर तुम मिलने आ जाओ
समीना सय्यद
नज़्म
बेवा की ख़ुद-कुशी
सो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँ
हो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँ
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
ज़िक्र करते हैं तिरा मुझ से ब-उन्वान-ए-जफ़ा
चारा-गर फूल पिरो लाए हैं तलवारों में
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
इंक़लाब-ए-हिन्द
कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार
फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
ग़ज़ल
रिश्ता-ए-जाँ को सँभाले हूँ कि अक्सर तिरी याद
इस में दो-चार गुहर आ के पिरो जाती है




