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ग़ज़ल
आशुफ़्ता उस के गेसू जब से हुए हैं मुँह पर
तब से हमारे दिल को है पेच-ओ-ताब क्या क्या
मीर तक़ी मीर
नज़्म
तवाइफ़
तेरी हो शोख़ी लचर है तेरा हर अंदाज़ पोच
सख़्त-तर है संग-ओ-आहन से तिरी बाहोँ का लोच
माहिर-उल क़ादरी
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रेख़्ता शब्दकोश
pech
पेच پیچ
उक्त के आधार पर चाल बाज़ी या चालाकी की कोई ऐसी बात जिसमें निकल भागने, पीछे हटने, मुकरने आदि के लिए और दूसरों को धोखे में रखने के लिए बहुत-कुछ अवकाश हो। घुमाव-फिराव या हेर-फेर की स्थिति। क्रि० प्र०-डालना।
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कुल्लियात
तल्ख़ उस का तो शहद-ओ-शकर है ज़ौक़ में हम नाकामों के
लोगों में लेकिन पोच कहा ये लुत्फ़-ए-बे-हंगाम किया
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
आशुफ़्ता उस के गेसू जब से हुए हैं मुँह पर
तब से हमारे दिल को है पेच-ओ-ताब क्या क्या
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
करते हैं 'मीर' मिल कर वाइज़ से हब्स दम का
क्या ये भी आ गए हैं उस पोच-गो के दम में
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
दम साधे ज़बाँ बाँधे कभी सर न उठाएँ झुकते चले जाएँ
नाकारा हुई पोच सी ये सोच तिरी अब चल सोच नई अब
शमीम अब्बास
कहानी
आसिफ़ फर्ऱुखी
कुल्लियात
हुरमत में मय की कहने से वाइज़ के है फ़ुतूर
क्या ए'तिबार रखती है उस पोच-गो की बात

