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नज़्म
परछाइयाँ
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब भाई जंग में काम आएँ
सरमाए के क़हबा-ख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इंक़लाब
अभी दिमाग़ पे क़हबा-ए-सीम-ओ-ज़र है सवार
अभी रुकी ही नहीं तेशा-ज़न के ख़ून की धार
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
हवेली
हँस रहा है ज़िंदगी पर इस तरह माज़ी का हाल
ख़ंदा-ज़न हो जिस तरह इस्मत पे क़हबा का जमाल
मख़दूम मुहिउद्दीन
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विषय
काबा
काबा शायरी
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रेख़्ता शब्दकोश
kahnaa
कहना کَہْنا
अपना उद्देश्य, भाव, विचार आदि शब्दों में व्यक्त करना। जैसे-(क) मुझे जो कुछ कहना था वह मैंने कह दिया। (ख) अब अपनी कहानी कहेंगे। मुहा०-कहना बदना = (क) किसी बात का निश्चय करना। (ख) प्रतिज्ञा करना। कहना-सुनना = बातचीत या वार्तालाप करना। पद-कहने की बात महत्त्वपूर्ण बात। कहने को = (क) नाममात्र को। यों ही। जैसे-कहने को ही यह नियम चल रहा है। (ख) यों ही काम चलाने या बात टालने के लिए। जैसे-उन्होंने कहने को कह दिया कि हम ऐसा नहीं करेंगे। कहने-सुनने को = कहने को।
chaahnaa
चाहना چاہْنا
ऐसी वस्तु की प्राप्ति अथवा ऐसे कार्य या बात की सिद्धि की इच्छा करना जिससे संतोष या सुख मिल सकता हो, पसंद करना, किसी के प्रति प्रेम, स्नेह या अनुराग का भाव होना
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नज़्म
शिकस्त-ए-ज़िंदाँ
दरीदा-तन है वो क़हबा-ए-सीम-ओ-ज़र जिस को
बहुत सँभाल के लाए थे शातिरान-ए-कुहन
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रक़्क़ासा-ए-औहाम
इस क़हबा-ए-बाज़ारी से रखो न तवक़्क़ो'
एहसान फ़रामोश-ओ-ज़ियाँ-कार है आलम
बेबाक भोजपुरी
रेख़्ती
है ये क़हबा इसे 'रंगीं' के हवाले कर दे
मेरी अन्ना को दो-गाना में तिरे वारी चीख़
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
नज़्म
औज-बिन-उनुक़
और बाएँ हाथ पर उस के धरे थे
बार थेटर होटलें जूए के अड्डे क़हबा-ख़ाने
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
मता-ए-क़हबा-ए-दुनिया पे कर न चश्म-ए-सियाह
कि माल-ए-ज़न नहीं खाते जो मर्द होते हैं
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
वलद-उल-क़हबा से पूछो न, तिरी ज़ात है क्या
बीज में उस के हैं मख़लूत कई ज़ात के बीज
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
किसी के अक़्द में रहती नहीं है लूली-ए-दहर
ये क़हबा रोज़-ए-अज़ल से है कुछ तलाक़-नसीब

