aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ristaa"
अमिना रौशनी रिशा
शायर
रीता गांगुली
कलाकार
Rita Shahani
लेखक
सर रिश्ता-ए-निज़ामत, हैदराबाद
पर्काशक
रीता प्रकाशन, लखनऊ
सर रिशता तालीम, पंजाब
अभी विसाल के ज़ख़्मों से ख़ून रिसता हैअभी ख़फ़ा है मोहब्बत का देवता मुझ से
हथेलियों के गुलाबों से ख़ून रिसता रहामगर वो शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना नहीं आई
मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मजबूर थे हम, मजबूर हैं हमइंसानियत के सीने में रिसता हुआ इक नासूर हैं हम
गो अब ख़ाल-ए-हिन्दू की अर्ज़िश नहीं हैएज़ार-ए-जहाँ पर वो रिसता हुआ गहरा नासूर
उँगलियों की सभी पोरों से लहू रिसता हैअपने दामन के ये किस दाग़ को धोना है हमें
रास्ता, सफ़र, मुसाफ़िर मंज़िल सब चलते रहने और ज़िन्दगी के बहाव की अलामत हैं। रास्तों के पेच-ओ-ख़म, रहगुज़ार की सख़्तियाँ सब एक मक़सद की तकमील के हौसले को पस्त नहीं कर पातीं। कोई ज़रूरी नहीं कि हर रहगुज़र मंज़िल का पता दे लेकिन रास्ता शायरी मंज़िल को पा लेने की धुन को ताक़त और हौसला अता करती है। पेश है रहगुज़र शायरी का यह इन्तिख़ाब आप के लिएः
मर्सिया शब्द अरबी मूल शब्द ‘रिसा’ से बना है जिसका अर्थ होता है किसी की मृत्यु पर विलाप करना| उर्दू शायरी की एक विधा के रूप में मर्सिया यूँ तो किसी भी प्रिय व्यक्ति के देहांत पर लिखी जाने वाली शोक-कविता हो सकता है|
रास्ता बन्द है
मुस्तफ़ा करीम
नॉवेल / उपन्यास
जिलानी बानो
कहानियाँ
Aadha Rasta
कृष्ण चंदर
Urdu Aur Hindi Zaban Ka Irtiqa Aur Unka Lisaniyati Rishta
मंज़र आज़मी
भाषा
Sar Rishta-e-Taleef-o-Tarjuma Jamia Usmania Hyderabad
मुस्तफ़ा अली ख़ाँ फ़ातिमी
आलोचना
Urdu aur Hindi ka Lisaniati Rishta
राम आसरा राज़
Rasta Bulata Hai
शकील आज़मी
काव्य संग्रह
Qaumi Zaban Aur Ilaqai Zabanon Ka Rishta
जीलानी कामरान
Aage Rasta Band Hai
हसन रहबर
अफ़साना
Ek Rasta Hai Zindagi
रफ़ी मुस्तफ़ा
नीतिपरक
रास्ता ये कहीं नहीं जाता
शीन काफ़ निज़ाम
संकलन
Rasta Aur Main
मख़मूर सईदी
Carrom Se Rishta
आरिफ़ नक़वी
अन्य
Bengal Ki Zabanon Se Urdu Ka Rishta
शान्ती रंजन भट्टा चारिया
Swarajya Ka Rasta
लाला लाजपत राय
लेख एवं परिचय
दर्द वो आग कि बुझती नहीं जलती भी नहींयाद वो ज़ख़्म कि भरता नहीं रिसता भी नहीं
गए दिनों का कोई ख़्वाब दफ़्न है शायदकि अब भी आँख से रिसता है बाक़ियात का दुख
दीवारों से ख़ूँ रिसता हैदरवाज़ों से मेरा इक इक राज़ अयाँ है
रिसता पानी भी ग़नीमत है वो दिन दूर नहींरौज़न-ए-चश्म से जब रेत निकलने लग जाए
बस-कि रिसता रहेज़ख़्म ऐसा लगा
मुंदमिल ज़ख़्म रिसता रहता हैशाइबा दाग़ पर भी पस का है
साक़िया गिर्या-ए-ग़म से मुझे मजबूर समझख़ून रिसता है ये टूटे हुए पैमाने से
जिस से ख़ून रिसता हैलाला-ज़ार राहों पर
ज़ख़्म रिसता रहे तो बेहतर हैशे'र होता रहे तो अच्छा है
लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर दोस्त बढ़ा देता हैज़ख़्म रिसता है तो कुछ और मज़ा देता है
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