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ग़ज़ल
वो जो बे-रुख़ी कभी थी वही बे-रुख़ी है अब तक
मिरे हाल पर इनायत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
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ग़ज़ल
कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा
रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है
नासिर काज़मी
शेर
कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा
रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है
नासिर काज़मी
नज़्म
रोटियाँ
रूखी ही रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीर
या पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीर
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दौर था इक गुज़र चुका नशा था इक उतर चुका
अब वो मक़ाम है जहाँ शिकवा-ए-बे-रुख़ी नहीं






