ग़ज़ल 16

नज़्म 1

 

शेर 3

हर दिसम्बर इसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं

फिर से आँखों में तिरे ख़्वाब आने लग जाएँ

जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था

उस कासा-ए-सवाल ने सोने नहीं दिया

मैं ये भी चाहती हूँ तिरा घर बसा रहे

और ये भी चाहती हूँ कि तू अपने घर जाए

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वीडियो 6

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
कोई जादू न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है

रेहाना रूही

जो सहीफ़ों में लिखी है वो क़यामत हो जाए

रेहाना रूही

तेरी गली को छोड़ के जाना तो है नहीं

रेहाना रूही

मैं ने तुम्हें चलना सिखाया था

अभी जैसे ये कल की बात लगती है रेहाना रूही

ये सोच कर न फिर कभी तुझ को पुकारा दोस्त

रेहाना रूही

सफ़र में रस्ता बदलने के फ़न से वाक़िफ़ है

रेहाना रूही

ऑडियो 10

किसी की चश्म-ए-गुरेज़ाँ में जल बुझे हम लोग

कोई जादू न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है

जो सहीफ़ों में लिखी है वो क़यामत हो जाए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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