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नज़्म
लौह-ओ-क़लम
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा
रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
दूद-ए-शम'-ए-कुश्ता था शायद ख़त-ए-रुख़्सार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत
ख़ुश हूँ फ़िराक़-ए-क़ामत-ओ-रुख़्सार-ए-यार से
सर्व-ओ-गुल-ओ-समन से नज़र को सताएँ हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ऐ दिल-ए-बेताब ठहर
रात का गर्म लहू और भी बह जाने दो
यही तारीकी तो है ग़ाज़ा-ए-रुख़सार-ए-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
तौक़-ओ-दार का मौसम
ख़ुशा नज़ारा-ए-रुख़सार-ए-यार की साअत
ख़ुशा क़रार-ए-दिल-ए-बे-क़रार का मौसम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कहा बुलबुल ने जब तोड़ा गुल-ए-सौसन को गुलचीं ने
इलाही ख़ैर कीजो नील-ए-रुख़्सार-ए-चमन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
नज़्म
सर-ए-वादी-ए-सीना
फिर बर्क़ फ़रोज़ाँ है सर-ए-वादी-ए-सीना
फिर रंग पे है शोला-ए-रुख़्सार-ए-हक़ीक़त
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से
फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
रुख़सार-ए-तर से ताज़ा हो बाग़-ए-अदन की याद
और उस की पहली सुब्ह की वो रसमसाहटें
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
रे भी ख़ाली है और ज़े पे है वो नुक्ता एक
कि मुशाबह है जो तिल से मिरी रुख़्सारे के
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
मनाज़िर-ए-सहर
क्या रूह-फ़ज़ा जल्वा-ए-रुख़्सार-ए-सहर है
कश्मीर दिल-ए-ज़ार है फ़िरदौस-ए-नज़र है
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
बढ़ गया बादा-ए-गुल-गूँ का मज़ा आख़िर-ए-शब
और भी सुर्ख़ है रुख़्सार-ए-हया आख़िर-ए-शब
मख़दूम मुहिउद्दीन
ग़ज़ल
खुल गया मुसहफ़-ए-रुख़्सार-ए-बुतान-ए-मग़रिब
हो गए शैख़ भी हाज़िर नई तफ़्सीर के साथ







