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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
आलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम है
हाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के
अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
नज़्म
हिण्डोला
यहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखे
नसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
नए इंसान का जब दौर-ए-ख़ुद-ना-आगही बदला
रुमूज़-ए-बे-ख़ुदी बदले तक़ाज़ा-ए-ख़ुदी बदला
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
रुमूज़-ए-मस्लहत को ज़ेहन पर तारी नहीं करता
ज़मीर-ए-आदमिय्यत से मैं ग़द्दारी नहीं करता
आसी करनाली
नज़्म
जरस-ए-गुल की सदा
हम पे वारफ़्तगी-ए-होश की तोहमत न धरो
हम कि रुम्माज़-ए-रुमूज़-ए-ग़म-ए-पिन्हानी हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के
अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
'अदम' ख़राबात की सहर है कि बारगाह-ए-रुमूज़-ए-हस्ती
इधर भी सूरज निकल रहा है उधर भी सूरज निकल रहा है
अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल
वो मौत जिस की हम 'एहसान' सुन रहे हैं ख़बर
रुमूज़-ए-ज़ीस्त भी समझा गई तो क्या होगा

