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ग़ज़ल
दोनों संग-ए-राह-ए-तलब हैं राह-नुमा भी मंज़िल भी
ज़ौक़-ए-तलब हर एक क़दम पर दोनों को ठुकराता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
पीवे मेरा ही लहू मानी जो लब उस शोख़ के
खींचे तो शंगर्फ़ से ख़ून-ए-शहीदाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा
मिरी रात भी तिरे नाम थी उसे किस ने तीरा-शबी कहा


