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नज़्म
कराची का मवासलाती मुशाइरा
किस हाल में कलाम-ए-बलाग़त हुआ अता
शायर है बाथ-रूम में सामे को क्या पता
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
वो कहते हैं कि मैं ने आप सा सामे नहीं देखा
मैं कहता हूँ कि इतनी पुर-कशिश तक़रीर किस की है
इफ़्तिख़ार राग़िब
ग़ज़ल
आशिक़ हुए तो इश्क़ में होश्यार क्यूँ न थे
हम इन के मदह-ख़्वाँ सर-ए-बाज़ार क्यूँ न थे
वारिस किरमानी
ग़ज़ल
ज़िंदगी मिलती नहीं है ज़िंदगी के शहर में
दुख ही दुख हैं आज-कल अपनी ख़ुशी के शहर में
समी अहमद समर
ग़ज़ल
सम-ए-इमरोज़ से मारा हुआ हारा हुआ दिन
किसी फ़र्दा की उमीदों पे बहलती हुई रात
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
लेख
क़ायम किए गए हैं वो रियासत-ए-भोपाल से ग़ालिब के तअल्लुक़ को समझने लिए अहम माख़िज़ात हैं।...












