aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "safiya"
सफ़िया शमीम
1920 - 2008
शायर
सफ़ीया राग अलवी
लेखक
सफ़िया अख़्तर
died.1953
सफ़िया अरीब
died.2001
सफ़ीया चौधरी
निगहत साहिबा
born.1983
साहिबा शहरयार
born.1953
सूफ़िया अनजुम ताज
सूफ़िया दीपीका कौसर
born.1972
रिंकी सिंह साहिबा
born.1987
हलीमा सादिया शगुफ़्ता
साहित्य अकादमी, दिल्ली
पर्काशक
सूफ़िया काशिफ़
साहिरा बेगम
सफ़ीना बेगम
born.1989
होना है दर्द-ए-इश्क़ से गर लज़्ज़त-आश्नादिल को ख़राब-ए-तल्ख़ी-ए-हिज्राँ तो कीजिए
बहार-ए-नौ की फिर है आमद आमदचमन उजड़ा कोई फिर हम-नफ़स क्या
ख़्वाब आँखों में तुम सजाओ तोकाग़ज़ी कश्तियाँ बनाओ तो
जिस को दिल से लगा के रक्खा थावो ख़ज़ाना लुटा गए आँसू
मैं औरत ज़ात हूँ मुझ को वफ़ा करने की आदत हैकभी रीतों रिवाजों से
साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत उर्दू किताबें
प्रमुख फि़ल्म निर्माता और निर्देशक, गीतकार और कहानीकार मिर्ज़ा गालिब पर टीवी सीरियल के लिए प्रसिद्ध साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित
प्रमुखतम आधुनिक शायरों में विख्यात. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित.
सफ़िया صَفِیَّہ
युद्ध में हाथ आए शत्रुओं की संपत्ति का वो भाग जो सरदार के लिए विशिष्ट हो
बनिया بَنِیا
व्यापार करने वाला व्यक्ति, व्यापारी, वैश्य
सामिया سامِیَہ
رک : سامی (۴).
आनिया آنیہ
‘इना' का बहु. बहुत से बरतन
ज़ेर-ए-लब
महिलाओं की रचनाएँ
Allama Shibli Nomani Bahaisiyat Sawaneh Nigar
सफ़ीया बी
Anjuman-e-Punjab Tareekh-o-Khidmat
सफ़ीया बानो
Pahli Nasl Ka Gunah
सफ़ीया सिद्दीक़ी
Safiyya Begam
मोहम्मदी बेगम
उपन्यास
Chandi Ka Joota
सफ़िया सुल्ताना सिद्दीक़ी
कहानी
Wadi-e-Ghurbat Mein
नॉवेल / उपन्यास
Aas Ka Ek Din
मिस सफ़ीया यूसुफ़ी
Fawaaid-e-Safiya
Qaid-e-Aazam Meri Nazar Mein
सफ़िया सुल्ताना अनवर
परिचय
Asad Mohammad Khan
सफ़ीया सुल्तान
जीवनी
Deepak Budki Ke Tanqeedi Mazameen-o-Tabsire
सफिया बानो अख़्तर हुसैन शैख़
शोध
Naved
Karnatak Urdu Academy Ki Khidmat 1987 Ta 1990
सफिया बेगम
Arsh-o-Amber
सामाजिक
आए हो तो मर्ज़ी से तुम जा सकते होऔर चाहो तो मुड़ कर वापस आ सकते हो
शम-ए-उम्मीद जला बैठे थेदिल में ख़ुद आग लगा बैठे थे
तुम मिरे शहर में आते हो चले जाते होदिल पे इक ज़ख़्म लगाते हो चले जाते हो
उमीदें मिट गईं अब हम-नफ़स क्यानशेमन की ख़ुशी रंज-ए-क़फ़स क्या
राबिया और सफ़िया हैतू है यशोधा तू है हलीमा
गर है नए निज़ाम की तख़्लीक़ का ख़यालआबादियों को नज़्र-ए-बयाबाँ तो कीजिए
शम-ए-हसरत जला गए आँसूरौनक़-ए-दिल बढ़ा गए आँसू
होश आया तो कहीं कुछ भी न थाहम भी किस बज़्म में जा बैठे थे
नमी दे कर जो मिट्टी कोमुसलसल गूँधते हो तुम
सहरा-ए-हस्तीमें
वो हसरत-ए-बहार न तूफ़ान-ए-ज़िंदगीआता है फिर रुलाने को अब्र-ए-बहार क्यूँ
दश्त गुलज़ार हुआ जाता हैक्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे
बाजी महमूदा आएँगीरज़िया सफ़िया को लाएँगे
ज़ख़्म शिद्दत में मुस्कुरा रहे थेहज़रत-ए-मीर याद आ रहे थे
रोना मुझे ख़िज़ाँ का नहीं कुछ मगर 'शमीम'इस का गिला है आई चमन में बहार क्यूँ
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