ग़ज़ल 5

 

शेर 6

जिस को दिल से लगा के रक्खा था

वो ख़ज़ाना लुटा गए आँसू

होश आया तो कहीं कुछ भी था

हम भी किस बज़्म में जा बैठे थे

दश्त गुलज़ार हुआ जाता है

क्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे

होना है दर्द-ए-इश्क़ से गर लज़्ज़त-आश्ना

दिल को ख़राब-ए-तल्ख़ी-ए-हिज्राँ तो कीजिए

रोना मुझे ख़िज़ाँ का नहीं कुछ मगर 'शमीम'

इस का गिला है आई चमन में बहार क्यूँ

संबंधित शायर

  • जोश मलीहाबादी जोश मलीहाबादी Uncle

"रावलपिंडी" के और शायर

  • अख़्तर होशियारपुरी अख़्तर होशियारपुरी
  • साबिर ज़फ़र साबिर ज़फ़र
  • जलील ’आली’ जलील ’आली’
  • बाक़ी सिद्दीक़ी बाक़ी सिद्दीक़ी
  • शुमामा उफ़ुक़ शुमामा उफ़ुक़
  • परवीन फ़ना सय्यद परवीन फ़ना सय्यद
  • हसन अब्बास रज़ा हसन अब्बास रज़ा
  • अफ़ज़ल मिनहास अफ़ज़ल मिनहास
  • नवेद फ़िदा सत्ती नवेद फ़िदा सत्ती
  • मुसतफ़ा राही मुसतफ़ा राही