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मंज़ूर आरिफ़

1924 - 1980 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

ग़ज़ल 19

शेर 4

बात तेरी सुनी नहीं मैं ने

ध्यान मेरा तिरी नज़र पर था

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ऐसा दिल-कश था कि थी मौत भी मंज़ूर हमें

हम ने जिस जुर्म की काटी है सज़ा ज़िंदाँ में

वो क्या गया कि हर इक शख़्स रह गया तन्हा

उसी के दम से थीं बाहम रिफाक़तें सारी

ई-पुस्तक 1

 

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