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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
कि इस निस्बत से ज़हर ओ ज़ख़्म को सहना ज़रूरी है
अजब ग़ैरत से ग़ल्तीदा-ब-ख़ूँ रहना ज़रूरी है
जौन एलिया
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान
अजनबी हाथों का बे-नाम गिराँ-बार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रेख़्ता शब्दकोश
kahnaa
कहना کَہْنا
अपना उद्देश्य, भाव, विचार आदि शब्दों में व्यक्त करना। जैसे-(क) मुझे जो कुछ कहना था वह मैंने कह दिया। (ख) अब अपनी कहानी कहेंगे। मुहा०-कहना बदना = (क) किसी बात का निश्चय करना। (ख) प्रतिज्ञा करना। कहना-सुनना = बातचीत या वार्तालाप करना। पद-कहने की बात महत्त्वपूर्ण बात। कहने को = (क) नाममात्र को। यों ही। जैसे-कहने को ही यह नियम चल रहा है। (ख) यों ही काम चलाने या बात टालने के लिए। जैसे-उन्होंने कहने को कह दिया कि हम ऐसा नहीं करेंगे। कहने-सुनने को = कहने को।
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ग़ज़ल
दर्द का कहना चीख़ ही उट्ठो दिल का कहना वज़्अ निभाओ
सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कहना बड़ों का मानो
डर है पड़े न सदमा ज़िल्लत का उस का सहना
चाहो अगर बड़ाई तो कहना बड़ों का मानो
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के रहना आ गया
और वो ये समझे कि मुझ को रंज सहना आ गया











