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नज़्म
शिकवा
साज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हम
नाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
तिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह दे
मुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह दे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी आज लरज़ लरज़ उठा
किस की निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँ
जिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जादू-ए-महमूद की तासीर से चश्म-ए-अयाज़
देखती है हलक़ा-ए-गर्दन में साज़-ए-दिल-बरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नौ-जवान ख़ातून से
तिरी चीन-ए-जबीं ख़ुद इक सज़ा क़ानून-ए-फ़ितरत में
इसी शमशीर से कार-ए-सज़ा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मजबूरियाँ
कोई नग़्मे तो क्या अब मुझ से मेरा साज़ भी ले ले
जो गाना चाहता हूँ आह वो मैं गा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ कि ला-मकाँ है
ये जहाँ मिरा जहाँ है कि तिरी करिश्मा-साज़ी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
जानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़
है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़





