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नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला-3
तुम्ही बताओ कि इस खंडर में जहाँ पे मकड़ी की सनअतें हों
जहाँ समुंदर हों तीरगी के
अली अकबर नातिक़
कुल्लियात
फ़रहाद से पत्थर पे हुईं सनअतें क्या क्या
दिल जा के जिगर-कावी में कुछ तू भी हुनर कर
मीर तक़ी मीर
नज़्म
हिन्दोस्ताँ
भारत में देखते थे हम सनअतें जहाँ की
मशहूर थी जहाँ में कारीगरी यहाँ की
आफ़ताब रईस पानीपती
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नज़्म
वतन से ख़िताब
मुझे ऐ वतन तू ज़रा बता किधर अब हैं वो तिरी सन’अतें
जो हर एक मुल्क से लाई थीं तिरे पास खींच के दौलतें
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
हिन्दोस्तान
भारत में देखते थे हम सन'अतें जहाँ की
मशहूर थी जहाँ में कारीगरी यहाँ की
बाबू मुर्ली धर
नज़्म
इतना मालूम है!
कभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसे
उस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगा
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
सबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया में
कि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
हक़ रा ब-सजूदे सनमाँ रा ब-तवाफ़े
बेहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दो

