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नज़्म
बे-परवाह उम्र
मोटे मोटे आँसू लिए कोने में बैठी सी हूँ
बारिशों में छप छप कर मिट्टी में सने पाँव
दिव्या महेश्वरी
ग़ज़ल
क्या बनाए साने-ए-क़ुदरत ने प्यारे हाथ पाँव
नूर के साँचे में ढाले हैं तुम्हारे हाथ पाँव
आग़ा अकबराबादी
ग़ज़ल
इक हर्फ़-ए-कुन में जिस ने कौन-ओ-मकाँ बनाया
सारे जहाँ का तुझ को आराम-ए-जाँ बनाया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुल्लियात
रहा न होगा ब-ख़ुद साने’-ए-अज़ल भी तब
बनाया होगा जब उस मुँह को दस्त-ए-क़ुदरत से
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
तेरे कूचे में तिरा जल्वा नज़र आया मुझे
साने-ए-जन्नत को देखा बाग़-ए-जन्नत देख कर
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
बुतों की बंदगी है शुक्रिया साने' की सन'अत का
वो काफ़िर क्यों हुआ जिस को ये दिलबर याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
नज़्म
बाइपोलर
इतिहास की मुर्दा किताबों और ख़ून से सने लिजलिजे अख़बारों को पढ़ते वक़्त
तुम ने मौत को याद किया
विक्रम
ग़ज़ल
बसान-ए-तख़्ता-ए-गुल मेरी फ़िक्र है आज़ाद
मिसाल-ए-क़ौस-ए-कुज़ह है मिरे ख़याल का रंग













