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ग़ज़ल
खुल कर न सर-ए-आम हो इज़हार भले ही
है बुग़्ज़ करें हम से वो इंकार भले ही
अज़ीमुद्दीन साहिल साहिल कलमनूरी
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शेर
बर-सर-ए-आम इक़रार अगर ना-मुम्किन है तो यूँही सही
कम-अज़-कम इदराक तो कर ले गुन बे-शक मत मान मिरे
कौसर नियाज़ी
ग़ज़ल
हालत-ए-क़ल्ब सर-ए-बज़्म बताऊँ क्यूँकर
पर्दा-ए-दिल में है इक पर्दा-नशीं का लालच
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
ऐन-उल-यक़ीन
सर-ए-आम उन्हें फाँसी का एलान करता है
सर-ए-आम अपनी सज़ा का एलान सुनता है
नसरीन अंजुम सेठी
ग़ज़ल
दिल में तीर-ए-इश्क़ है और फ़र्क़ पर शमशीर-ए-इश्क़
क्या बताएँ पड़ गई है पाँव में ज़ंजीर-ए-इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
किसी के संग-ए-दर से एक मुद्दत सर नहीं उट्ठा
मोहब्बत में अदा की हैं नमाज़ें बे-वुज़ू बरसों


