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ग़ज़ल
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाए है मुझ से
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उस ने सौंपा नहीं मुझ को मिरे हिस्से का वजूद
उस की कोशिश है कि मुझ से मिरी रंजिश भी रहे
कुमार विश्वास
ग़ज़ल
मैं ने सौंपा था तुझे इक काम सारी उम्र में
वो बिगड़ता ही गया ऐ दिल कहाँ बनता गया
फ़िराक़ गोरखपुरी
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saa.nsaa
साँसा سانسا
जीवन। जिंदगी। जैसे-जब तक साँसा, तब तक आशा। पुं० [सं० संशय] १. संदेह। शक। उदा०-सतगुर मिलिया साँसा भाग्या, सैन बताई साँची।-मीराँ। २. भय। डर। पुं० साँसत। जैसे-मेरी जान तभी से साँसे में पड़ी है। वि० साँचा (सच्चा)।
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ग़ज़ल
चूम कर जिस को ख़ुदा के हाथ सौंपा था 'नसीम'
उस के बारे में हमेशा सोचना अच्छा नहीं
इफ़्तिख़ार नसीम
नज़्म
तू अगर सैर को निकले
शाम की छाँव ने सौंपा है वो जोड़ा तुझ को
कि कभी पास से देखे जो हिमाला तुझ को
जोश मलीहाबादी
शेर
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाए है मुझ से
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
की सुपुर्द-ए-दर-ए-बुत-ख़ाना अजल ने मिरी ख़ाक
किस को सौंपा मुझे ज़ालिम ने ख़ुदा के बदले
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
इश्क़ ने सौंपा है काम अपना अब तो निभाना ही होगा
मैं भी कुछ कोशिश करता हूँ आप भी कुछ इमदाद करें
अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल
इश्क़ ने सौंपा है मुझ को इक सहरा की ता'मीर का काम
और हिदायत की है ज़र्रा भर वीरानी कम न पड़े







