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ग़ज़ल
इश्क़ तो ख़ैर 'ख़लील' अब भी बुलाए लेकिन
किस में हिम्मत है शब-ए-हिज्र मना कर सोए
ख़लील हुसैन बलूच
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ग़ज़ल
वो ख़ुदा-परस्त 'ख़लील' जो सर-ए-दार हैं
हम उन्ही के क़ुर्ब की लज़्ज़तों के असीर हैं
ख़लील हुसैन बलूच
ग़ज़ल
हिज्र-ए-माशूक़ है तूलानी तो अब उम्र 'ख़लील'
हज़रत-ए-ख़िज़्र की आऊँगा दोबारा ले कर
ख़लील हुसैन बलूच
ग़ज़ल
बे-वफ़ा तंग-नज़र को है ये पैग़ाम-ए-'ख़लील'
सोच मुसबत रखो इंसाँ बनो इंसाँ जैसे
ख़लील अंसारी एडवोकेट
ग़ज़ल
काट कर दस्त-ए-दुआ को मेरे ख़ुश हो ले मगर
तू कहाँ आख़िर ये शाख़-ए-बे-समर ले जाएगा
