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नज़्म
मुफ़्लिसी
जब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाए
ले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाए
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
गर सग-ए-गुरसिना ले शूम के मतबख़ की बास
तो भला हड्डी की जा क्या वो भंबोड़े पत्थर
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
रैलियाँ ही रैलियाँ
और इस मंज़र के पीछे रैली-बाज़ों का हुजूम
तुझ को ले आया कहाँ ऐ शहर तेरा बख़्त-ए-शूम
रज़ा नक़वी वाही
ग़ज़ल
सर-कशी करता है यूँ हर आन मेरा नफ़्स-ए-शूम
जिस तरह से दम-ब-दम हो जाए है घोड़ा अलिफ़
जोशिश अज़ीमाबादी
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ग़ज़ल
ख़िज़ान-ए-शूम ये गुलशन के हक़ में क्या क़यामत है
कि इस के आते ही बे-बर्ग हो गुल बे-नवा बुलबुल
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं
मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
बशीर बद्र
नज़्म
शिकवा
महफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरे
मय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरे






