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ग़ज़ल
नहीं फ़क़्र ओ सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़-बाज़ी वो निगह की तेग़-बाज़ी
अल्लामा इक़बाल
हास्य
याँ न वो ना'रा-ए-तकबीर न वो जोश-ए-सिपाह
सब के सब आप ही पढ़ते रहें सुब्हान-अल्लाह
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
मीर-ए-सिपाह ना-सज़ा लश्करियाँ शिकस्ता सफ़
आह वो तीर-ए-नीम-कश जिस का न हो कोई हदफ़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ऐ रौशनियों के शहर
हर जानिब बे-नूर खड़ी है हिज्र की शहर-पनाह
थक कर हर सू बैठ रही है शौक़ की मांद सिपाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फ़क़्र के हैं मो'जिज़ात ताज ओ सरीर ओ सिपाह
फ़क़्र है मीरों का मीर फ़क़्र है शाहों का शाह
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक उदास शाम के नाम
सिपाह-ए-महर का फ़सील-ए-शब को इंतिज़ार है
कब आएगा वो शख़्स जिस का सब को इंतिज़ार है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
लहु नज़्र दे रही है हयात
कोई सिपाह-ए-सितम पेशा चूर कर न सकी
बशर की जागी हुई रूह के अयाग़ों को
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तेरे बा'द
वो वलवले वो उमंगें वो जुस्तुजू न रही
तिरी सिपाह को अब भी तिरी ज़रूरत है
सैफ़ुद्दीन सैफ़
नज़्म
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहा
वो आब-ओ-ताब-ओ-शौकत-ए-ऐवान-ए-ख़ुसरवी
वो महकमों की शान वो जल्वा सिपाह का
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
कभी छुपे हुए ख़ंजर कभी खिंची हुई तेग़
सिपाह-ए-ज़ुल्म के एक एक ढब से वाक़िफ़ हैं

