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नज़्म
रामायण का एक सीन
अंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेद
सोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीद
चकबस्त बृज नारायण
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विषय
सोच
सोच शायरी
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ग़ज़ल
प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या
तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ज़ेहरा ने बहुत दिन से कुछ भी नहीं लिक्खा है
पर लिक्खे तो क्या लिक्खे? और सोचे तो क्या सोचे?
कुछ फ़िक्र भी मुबहम है कुछ हाथ लरज़ता है
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
बुलावा
मैं हूँ ऐसा पात हवा में पेड़ से जो टूटे और सोचे
धरती मेरी गोर है या घर ये नीला आकाश जो सर पर