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नज़्म
दर-मद्ह-आम
बोले कि राज़-वाज़ तो कुछ भी नहीं है बस
संडे की शाम पाँच बजे इज़्न-ए-आम है
ख़ालिद महमूद
ग़ज़ल
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
बशीर बद्र
नज़्म
शिकवा
नक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम ने
ज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम ने












