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ग़ज़ल
सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
ग़ालिब
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुलज़ार
शेर
दर्द-ए-दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को
वर्ना ताअत के लिए कुछ कम न थे कर्र-ओ-बयाँ
ख़्वाजा मीर दर्द
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रेख़्ता शब्दकोश
raat
रात رات
समय का वह भाग जिसमें सूर्य का प्रकाश हम तक नहीं पहुंचता। सन्ध्या से प्रातःकाल तक का समय, जिसमें आकाश में चन्द्रमा और तारे दिखाई देते हैं, निशा, रजनी
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नज़्म
बरसात की बहारें
जंगल सब अपने तन पर हरियाली सज रहे हैं
गुल फूल झाड़-बूटे कर अपनी धज रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची 'इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
ताअत नहीं है वो कि जो हो बे-हुज़ूर-ए-क़ल्ब
ऐ शैख़ क्या धरा है रुकू-ओ-सुजूद में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या
तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में












