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शेर
चमक जुगनू की बर्क़-ए-बे-अमाँ मालूम होती है
क़फ़स में रह के क़द्र-ए-आशियाँ मालूम होती है
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
सर पे तेग़-ए-बे-अमाँ हाथों में प्याला ज़हर का
किस तरह होंटों पे लाऊँ हाल अपने शहर का
मोहसिन एहसान
ग़ज़ल
तिरी महफ़िल में दश्त-ए-बे-अमाँ ले कर नहीं आया
मैं अपने गहरे सन्नाटे यहाँ ले कर नहीं आया
अंजुम नियाज़ी
ग़ज़ल
चमन वालों से बर्क़-ए-बे-अमाँ कुछ और कहती है
मगर मेरी तो शाख़-ए-आशियाँ कुछ और कहती है
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
इस हुजूम-ए-बे-अमाँ में कोई अपना भी तो हो
मैं गले किस को लगाऊँ कोई ज़िंदा भी तो हो
इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ये अपना शहर जो है दश्त-ए-बे-अमाँ ही तो है
इस ए'तिबार से दिल दर्द का मकाँ ही तो है