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सआदत हसन मंटो
ग़ज़ल
हर इक अपनी ज़रूरत के तहत हम से है मिलता
हमें भी अब कोई हस्ब-ए-ज़रूरत चाहिए है
फ़रहत नदीम हुमायूँ
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aahaT
आहट آہَٹ
आने-जाने या चलने की हल्की सी आवाज़, संक्षिप्त सी चाप (अधिकतर पाँव या किसी और क़रीने के साथ प्रयुक्त)
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सय्यद सुलैमान नदवी
ग़ज़ल
'शुजाअ' तेरे ही तहत-अल-लफ़्ज़ से कुछ हो तो हो वर्ना
ग़ज़ल में शाएरान-ए-ख़ुश-गुलू से कुछ नहीं होगा
शुजा ख़ावर
ग़ज़ल
चढ़ते हैं लोग फाँसी पे किस जुर्म के तहत
तख़्ती तो पढ़ ही लेते हो तख़्ते पढ़ा करो
समीना रहमत मनाल
ग़ज़ल
तहत में जब भी पढ़ी तो बन के निकली इंक़लाब
जब तरन्नुम में पढ़ी तो झूम उठी मेरी ग़ज़ल
एजाज़ुलहक़ शहाब
नज़्म
मुदावा हो नहीं सकता
के तहत से उतरी है किन फूलों की ख़ुश्बू ज़ेब-ए-तन
कर के सवाद-ए-शब से झाँकी है









