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ग़ज़ल
मंज़िल-ए-इश्क़ पे तन्हा पहुँचे कोई तमन्ना साथ न थी
थक थक कर इस राह में आख़िर इक इक साथी छूट गया
फ़ानी बदायुनी
नज़्म
भूका बंगाल
भीक-मँगाई से थक थक कर उतरे मौत के घाट
जियन-मरन के डंडे मिलाए बैठे हैं चंडाल रे साथी
वामिक़ जौनपुरी
ग़ज़ल
हमारे नाले भी थक थक के अब तो बैठ रहे
गए वो दिन कि उठाते थे आसमाँ सर पर
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
हर नफ़स कहता है थक थक कर ये मुझ से हर नफ़स
रहरव-ए-गुम-कर्दा-मंज़िल की कोई मंज़िल नहीं

