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ग़ज़ल
वसवास मिरी तीनत ही नहीं और यास मिरी फ़ितरत ही नहीं
उम्मीद की हल्की ज्योति को आँखों में जलाए फिरता हूँ
मीर सय्यद मुज़फ्फर अली ज़फ़र मुज़ाहरी
कुल्लियात
ख़ाक-ए-हसरत-ज़दगाँ पर तू गुज़र बे-वसवास
इन सितम-कुश्तों से अब अर्ज़-ए-तमन्ना क्या हो
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
अश्क-ए-गर्म ओ आह-ए-सर्द आशिक़ के तईं वसवास कर
ख़ूब है परहेज़ जब हो मुख़्तलिफ़ आब-ओ-हवा
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
जान आ बर में कि फिर कुछ ग़म-ओ-वसवास नहीं
तू नहीं पास तो फिर कुछ भी मिरे पास नहीं
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
नज़्म
दरिया-ए-गोमती
चाल में तेरी है पिंहाँ इक अदा-ए-ख़ास भी
तू ज़रा सी है अनोखी और बे-वसवास भी
फ़ातिमा वसीया जायसी
नज़्म
हमेशा देर कर देता हूँ
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं








