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ग़ज़ल
समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग
मग़रिब के यूँ हैं जम्अ' ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम
हसरत मोहानी
नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
ज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़
कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गार
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
कहे है मुर्ग़-ए-दिल ऐ काश में ज़ाग़-ए-कमाँ होता
कि ता शाख़-ए-कमाँ पर उस की मेरा आशियाँ होता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
ज़ग़न-ओ-ज़ाग़ की गुलशन में सदा है हर सू
मुर्ग़-ए-ख़ुश-नग़्मा न आवाज़ सुनाना हरगिज़
मीर मेहदी मजरूह
ग़ज़ल
वस्फ़ लिक्खे जो तिरे गोरे बदन के मैं ने
हो गई ज़ाग़-ए-क़लम की वहीं मिंक़ार सफ़ेद
