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नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी
ख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त
जिन का हर लफ़्ज़ मुझे याद है पानी की तरह
याद थे मुझ को जो पैग़ाम-ए-ज़बानी की तरह
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए
इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ
नोशी गिलानी
शेर
उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए
इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ
नोशी गिलानी
नज़्म
ज़ोहद और रिंदी
है उस की तबीअत में तशय्यो भी ज़रा सा
तफ़्ज़ील-ए-अली हम ने सुनी उस की ज़बानी







