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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू है
यक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हम तो रहवार-ए-ज़बूँ हैं वो मुक़द्दर का सवार
ख़ुद ही महमेज़ करे ख़ुद ही इनाँ खेंचता है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अब जो रोते हैं मिरे हाल-ए-ज़बूँ पर 'अख़्तर'
कल यही थे मुझे हँस हँस के रुलाने वाले
अख़्तर सईद ख़ान
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ग़ज़ल
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे
मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शिकस्त-ए-अना
ऐसे लगता है कि जैसे मिरा मामूरा-ए-जाँ
किसी सैलाब-ज़दा घर की ज़बूँ-हाली है



