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नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
वो ल'अल ओ लब के तज़्किरे, वो ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के ज़मज़मे
वो कारोबार-ए-आरज़ू वो वलवले, वो हमहमे
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
भली लगती है आँखों को नए फूलों की रंगत भी
पुराने ज़मज़मे भी गूँजते रहते हैं कानों में
अहमद मुश्ताक़
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zamzama
ज़मज़माزَمْزَمَہ
चहचहा, चहचहाना, चहकार, चिड़ियों की चहक, कलरव गान, धीमे सुरों का राग, कम आवाज़ का राग, गीत, तराना, नग़मा, वो आवाज़ जो कुछ दूर से आए और मक्खियों की भुनभुनाहट की तरह सुनाई दे, वो आवाज़ जो गले के अंदर से एक विशेष लहर के साथ निकले, तलवार के चलने की आवाज़, खनक, वो अर्ध सुरीली ध्वानी जो अग्नि पूजा करने वाले अर्थात पारसी लोग खाना खाते समय या पूजा अर्चना करते समय निकालते हैं इसमें होंठ या ज़बान नहीं हिलाते बल्कि नाक और हलक़ से आवाज़ उत्मन्न होती है
zamzam
ज़मज़मضَمْضَم
साहसी, वीर, बहादुर, दिलेर, शेर
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नज़्म
रात और रेल
जैसे मौजों का तरन्नुम जैसे जल-परियों के गीत
एक इक लय में हज़ारों ज़मज़मे गाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सरमाया-दारी
ये अक्सर लूट कर मासूम इंसानों को राहों में
ख़ुदा के ज़मज़मे गाती है छुप कर ख़ानक़ाहों में
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
वज्द में लाते हैं मुझ को बुलबुलों के ज़मज़मे
आप के नज़दीक बा-मअ'नी सदा हो या न हो
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
इंक़लाब
झूम उठते हैं फ़रिश्ते तक तिरे नग़्मात पर
हाँ ये सच है ज़मज़मे तेरे मचाते हैं वो धूम
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
'आज़ाद' साज़-ए-दिल पे हैं रक़्साँ वो ज़मज़मे
ख़ुद सुन सकूँ मगर न किसी को सुना सकूँ
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
ज़मज़मे सुन कर मिरे सय्याद-ए-गुल-रू ने कहा
ज़ब्ह कीजे ऐसे बुलबुल को न छोड़ा चाहिए



