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नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
मैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरीं
आबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ए'तिराफ़
ख़ाक में आह मिलाई है जवानी मैं ने
शोला-ज़ारों में जलाई है जवानी मैं ने
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
शीशों का मसीहा कोई नहीं
या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़्वाब नहीं देखा है
ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का
चाँद सी मिट्टी के ज़र्रों से सदा आने का
वसीम बरेलवी
नज़्म
मैं उसे वाक़िफ़-ए-उल्फ़त न करूँ
निकहत-ओ-नूर से लबरेज़ नज़ारों के सिवा
सब्ज़ा-ज़ारों के सिवा और सितारों के सिवा
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
न उट्ठा फिर कोई 'रूमी' अजम के लाला-ज़ारों से
वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ वही तबरेज़ है साक़ी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हम ख़ाक के ज़र्रों में हैं 'अख़्तर' भी, गुहर भी
तुम बाम-ए-फ़लक से, कभी उतरो तो पता हो
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
इश्क़ से तेरे बढ़े क्या क्या दिलों के मर्तबे
मेहर ज़र्रों को किया क़तरों को दरिया कर दिया
हसरत मोहानी
नज़्म
मोहब्बत
हुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ा
गले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
किसान
डूबता है ख़ाक में जो रूह दौड़ाता हुआ
मुज़्महिल ज़र्रों की मौसीक़ी को चौंकाता हुआ
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
या जगा देते हैं ज़र्रों के दिलों में मय-कदे
या बना लेते हैं मेहर-ओ-माह को पैमाना हम






