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ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद आस्ताँ नहीं मिलता
ज़मीं मिले तो मिले आसमाँ नहीं मिलता
सय्यद वाजिद अली फ़र्रुख़ बनारसी
ग़ज़ल
सर-ए-नियाज़ झुका है ज़े-राह-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद
तिरे करम की क़सम कोई मुद्दआ तो नहीं
सय्यद आशूर काज़मी
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ग़ज़ल
मैं उमीद-ए-लुत्फ़ में महव-ए-जबीं-साई रहा
वो मिरा ज़ौक़-ए-सुजूद-ए-आस्ताँ देखा किए
कौकब मुरादाबादी
ग़ज़ल
घुट के रह जाए न सर ही में कहीं ज़ौक़-ए-सुजूद
मैं तो सर हर दर पे रख दूँ पर कोई दर है कहाँ
मुहिब आरफ़ी
ग़ज़ल
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
दर से बढ़ने नहीं देता है मुझे ज़ौक़-ए-सुजूद
मैं हूँ नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हैं तिरी दरबानों के
रियाज़ ख़ैराबादी
शेर
ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
आलम-ए-हुस्न ख़ुदाई है बुतों की ऐ 'ज़ौक़'
चल के बुत-ख़ाने में बैठो कि ख़ुदा याद रहे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में ऐ 'ज़ौक़'
उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
ता-साफ़ करे दिल न मय-ए-साफ़ से सूफ़ी
कुछ सूद-ओ-सफ़ा इल्म-ए-तसव्वुफ़ नहीं करता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
दिल-ए-बद-ख़्वाह में था मारना या चश्म-ए-बद-बीं में
फ़लक पर 'ज़ौक़' तीर-ए-आह गर मारा तो क्या मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
क़ीमत में जिंस-ए-दिल की माँगा जो 'ज़ौक़' बोसा
क्या क्या न उस ने हम को खोटी-खरी सुनाई