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ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद आस्ताँ नहीं मिलता
ज़मीं मिले तो मिले आसमाँ नहीं मिलता
सय्यद वाजिद अली फ़र्रुख़ बनारसी
ग़ज़ल
सर-ए-नियाज़ झुका है ज़े-राह-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद
तिरे करम की क़सम कोई मुद्दआ तो नहीं
सय्यद आशूर काज़मी
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sufuuf-e-fauj
सुफ़ूफ़-ए-फ़ौजصُفُوفِ فَوج
सेना की पंक्तियाँ, फ़ौज की क़तारें
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ग़ज़ल
मैं उमीद-ए-लुत्फ़ में महव-ए-जबीं-साई रहा
वो मिरा ज़ौक़-ए-सुजूद-ए-आस्ताँ देखा किए
कौकब मुरादाबादी
ग़ज़ल
घुट के रह जाए न सर ही में कहीं ज़ौक़-ए-सुजूद
मैं तो सर हर दर पे रख दूँ पर कोई दर है कहाँ
मुहिब आरफ़ी
ग़ज़ल
दर से बढ़ने नहीं देता है मुझे ज़ौक़-ए-सुजूद
मैं हूँ नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हैं तिरी दरबानों के
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई