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ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
है ''ज़'' बाज़ार में तो दरमियाँ 'ज़रयून' में अव्वल
तो ये इब्राफ़नीक़ी खेलते हर्फ़ों से थे हर पल
जौन एलिया
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा
उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
अमीर ख़ुसरो
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शेर
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
'जिगर' वो भी ज़े-सर-ता-पा मोहब्बत ही मोहब्बत हैं
मगर उन की मोहब्बत साफ़ पहचानी नहीं जाती
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
ज़े के रेशमी रुमालों को किस किस की नज़रों से छुपाएँ
कैसे हैं वो लोग जिन्हें ये राज़ छुपाने आ जाते हैं
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
राज़-ए-दरून-ए-पर्दा ज़े-रिंदान-ए-मस्त पुर्स
सालिक है क्यूँ हिजाब-ए-शुहूद-ओ-वजूद में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
'असद' जुज़ आब-ए-बख़्शीदन ज़े-दरिया ख़िज़्र को क्या था
डुबोता चश्मा-ए-हैवाँ में गर कश्ती सिकंदर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रे भी ख़ाली है और ज़े पे है वो नुक्ता एक
कि मुशाबह है जो तिल से मिरी रुख़्सारे के
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
उद्धरण
सआदत हसन मंटो
हास्य
हज़ारों हादसे देखे ज़मानी भी मकानी भी
बहुत से रोग पाले हैं ज़े-राह-ए-क़द्रदानी भी








