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ग़ज़ल
चराग़ शर्मा
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
बरसों से 'विला' एक किनारे पे खड़ी है
तुम नील के साहिल पे मिला क्यों नहीं करते
वाला जमाल एल-एसिली
ग़ज़ल
मैं तो वफ़ा की दुनिया में रहती हूँ ऐ 'विला'
इक बेवफ़ा से कोई भी निस्बत नहीं मुझे
वाला जमाल एल-एसिली
ग़ज़ल
हम ने खाए ज़ख़्म 'विला' हम उन से दूर ही रहते हैं
फूलों से वो खेले जिस को काँटों की परवाह नहीं