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ग़ज़ल
ये रंग-ए-बे-कसी रंग-ए-जुनूँ बन जाएगा ग़ाफ़िल
समझ ले यास-ओ-हिरमाँ के मरज़ की इंतिहा क्या है
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब
बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
जाँचता हूँ वुसअत-ए-दिल हमला-ए-ग़म के लिए
इम्तिहाँ है रंज-ओ-हिरमाँ की फ़रावानी मुझे
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ग़म-ओ-अंदोह-ओ-बे-ताबी अलम बे-ताक़ती हिरमाँ
कहूँ ऐ हम-नशीं ता-चंद ग़म-हा-ए-फ़िरावाँ को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
सभी मजरूह हैं इस सैद-गाह-ए-ऐश-ओ-हिरमाँ में
किसी का ज़ख़्म ओछा है किसी का ज़ख़्म गहरा है