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ग़ज़ल
ब-जोश-ए-इश्क़ लटके है नहीं मुझ को तमीज़ इतनी
ब-मिज़्गाँ लख़्त-ए-दिल या दुर है या मरजान है क्या है
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
एसी क्यूँ रसमसी मरजान और क्यूँ लाल हैं अँखियाँ
अगर तुम नीं करी नहिं ग़ैर सीं मिल रात रंग-रलियाँ
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
जब्बार वासिफ़
ग़ज़ल
سورج مرجان میں جیوں دستا نظر ووں کاپتی تہر تہر
جو لٹ پیچاں بھری سرتے اور رخ اپر ڈھلی ہے آ
मुश्ताक़ बेदरी
ग़ज़ल
मुर्ग़ान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ 'शाद' ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुम को आना हो ऐसे में अभी शादाब हैं हम
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का
मुरव्वत हुस्न-ए-आलम-गीर है मर्दान-ए-ग़ाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
क्यूँ ख़्वार हैं मर्दान-ए-सफ़ा-केश ओ हुनर-मंद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर
कि दुनिया में फ़क़त मर्दान-ए-हूर की आँख है बीना
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मुँह पे ले दामन-ए-गुल रोएँगे मुर्ग़ान-ए-चमन
बाग़ में ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बा'द
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का
कि हर यक क़तरा-ए-ख़ूँ दाना है तस्बीह-ए-मरजाँ का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-दिलदारी-ए-गुलज़ार करूँ या न करूँ
ज़िक्र-ए-मुर्ग़ान-ए-गिरफ़्तार करूँ या न करूँ